भक्तिकाल (पूर्व मध्यकाल)
1375-1700
इस युग के बारे में
भक्तिकाल को 'हिंदी साहित्य का स्वर्ण युग' माना जाता है। यह एक ऐसा समय था जब भक्ति आंदोलन ने पूरे भारत को आध्यात्मिक और सामाजिक रूप से प्रभावित किया। इस युग की कविता ने जाति-पाति, कर्मकांड और बाहरी आडंबरों का विरोध करते हुए ईश्वर के प्रति निःस्वार्थ प्रेम, मानवीय मूल्यों और सामाजिक सद्भाव पर जोर दिया। इसे मुख्य रूप से दो धाराओं में विभाजित किया गया है: निर्गुण (निराकार ईश्वर की पूजा) और सगुण (साकार ईश्वर की पूजा)। निर्गुण धारा में कबीर जैसे ज्ञानमार्गी और जायसी जैसे प्रेममार्गी कवि हुए, जबकि सगुण धारा में सूरदास और मीराबाई जैसे कृष्ण-भक्त और तुलसीदास जैसे राम-भक्त कवि हुए। इस काल ने अवधी और ब्रजभाषा को साहित्यिक ऊंचाइयों पर पहुँचाया।
प्रमुख विशेषताएँ
- भक्ति भावना की प्रधानता।
- गुरु की महिमा का गुणगान।
- सामाजिक कुरीतियों और आडंबरों का विरोध।
- समन्वय की भावना।
- अवधी और ब्रजभाषा का साहित्यिक विकास।
- जीवन के दार्शनिक और आध्यात्मिक पहलुओं का चित्रण।
प्रमुख कवि और रचनाएँ
कबीरदास
बीजक (साखी, सबद, रमैनी)
सूरदास
सूरसागर
सूरसारावली
साहित्य-लहरी
तुलसीदास
रामचरितमानस
विनय पत्रिका
हनुमान चालीसा
मलिक मुहम्मद जायसी
पद्मावत
अखरावट
मीराबाई
पदावली
नरसी जी का मायरा